Friday, May 23, 2008

कुरकुरी धूप को हथेली से मसलकर

हिन्द-युग्म की यूनिकवि प्रतियोगिता में शीर्ष १० में आने का कवि अनिल जींगर का यह दूसरा मौका है। इस बार इनकी कविता 'कुरकुरी धूप' नवें पायदान पर है।

पुरस्कृत कविता- कुरकुरी धूप

बड़ी मुश्किल से ढूँढा है, उस सॉल को
ना जाने कितने रंगो से बंधी थी जो..
डोर खोली तो यादें महकती सी,
मेरी पलकों को सहलाती हुई
नमकीन हीरे दे गयी..

जब भी चाहता हूँ वो रंग मीठा-सा लगता है..
जहां की गर्त से दरिया का एक छींटा सा लगता है..
अजीब होती हैं यादें तेरी, अजीब चौकाती हैं ये..
बहुत वक़्त गुजारा है इस सॉल को खोलने में..

जब कभी ओढ़ लेता हूँ तो महसूस होता है..
कुरकुरी धूप को हथेली से मसलकर तुमने,
छुपा दिया हो इस सॉल में कहीं
ना सर्दी आती इसमें ना इससे धूप जाती है,
बस उँगली पकड़ती है छोड़ आती है,
वक़्त के गढ़े निशान पे फिर कदम रखता हूँ
दोहराता हूँ वही सब जो उस सॉल में गुम है.

बड़ी मुश्किल से खोला है इस सॉल को
बड़ी मुश्किल से संभलती हैं यादें तेरी...........



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५, ७॰३, ६॰९, ६॰७
औसत अंक- ६॰४७५
स्थान- दूसरा


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ३॰५, ४॰५, ३, ६॰४७५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ४॰३६८७५
स्थान- नौवाँ


पुरस्कार- डॉ॰ रमा द्विवेदी की ओर से उनके काव्य-संग्रह 'दे दो आकाश' की स्वहस्ताक्षरित प्रति।


Thursday, May 22, 2008

20 और पहली कविताएँ






काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - पहली कविता (भाग-3)

विषय-चयन - अवनीश गौतम

अंक - पंद्रह

माह - मई 2008





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पहली कविता के प्रकाशन के बाद बहुत से रोचक तथ्य खुलकर सामने आये हैं। हर कवि के लिए कविता लिखने का कारण अलग-अलग है। लेकिन कितना सुखद है कि कविमन का अत्यधिक संवेदनशील होना ही, उसमें कविता का बीज रोप पाया है! इस बार, एक कवयित्री मीनाक्षी धनवंतरि ने अपनी दो ऐसी प्रारम्भिक कविताएँ भेजीं कि हमारे लिए यह तय कर पाना मुश्किल हो गया कि कौन सी प्रकाशित करें कौन नहीं। आखिरकार हमने भी पाठकों पर छोड़ दिया है।

इस बार हम काव्य-पल्लवन के प्रतिभागियों के लिए एक उद्घोषणा लेकर उपस्थित हैं। हैदराबाद से हिन्दी की एक साहित्यिक पत्रिका (छमाही) प्रकाशित होती है 'पुष्पक' जिसकी संपादिका हैं डॉ॰ अहिल्या मिश्रा और डॉ॰ रमा द्विवेदीमई माह के काव्य-पल्लवन के इस विशेषांक में भाग लेने वाले ३० भाग्यशाली कवियों को इस पत्रिका के वर्ष 2007 (प्रथम) अंक की एक-एक प्रति भेंट की जायेगी। तो यदि अभी तक आप अपनी प्रथम कविता न भेज पायें हों तो कृपया जल्द से जल्द भेजें और अपने मित्र कवियों/कवयित्रियों को भी इसकी सूचना दें।

यदि हमारे पाठकों में से कोई अपनी पसंद की कोई साहित्यिक कृति प्रदान करना चाहे या आप किसी पत्रिका के संपादक हों, किसी पुस्तक के संपादक हों और अपनी कृति भेंट करना चाहें, तो कृपया hindyugm@gmail.com पर संपर्क करे।

अब तक 'काव्य-पल्लवन पहली कविता विशेषांक' के दो भाग प्रकाशित हो चुके हैं, जिन्हें निम्न सूत्रों ने पढ़ा जा सकता हैं-




आज http://merekaviimitra.blogspot.com को पहली कविता का रूप देने में अपना हुनर दिखाया है हमारे सहयोग प्रशेन क्यावाल ने अपनी कंपनी वेब एंड मीडिया लिमिटेड द्वारा। मुख-पृष्ठ का हेडर बनाया है राहुल पाठक ने।

शेष अच्छा-बुरा तो पाठकों की प्रतिक्रियाएँ बतायेंगी।

आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।

*** प्रतिभागी ***
| देवेंद्र पांडेय | डा. रमा द्विवेदी | अशरफ अली "रिंद" | ममता गुप्ता | रजत बख्शी |राजिंदर कुशवाहा | गरिमा तिवारी | विनय के जोशी | डा0 अनिल चड्डा | यश छाबड़ा | कवि कुलवंत सिंह |
| एस. कुमार शर्मा | मीनक्षी धनवंतरी | शुभाशीष पाण्डेय | शिफ़ाली | पूजा अनिल | अविनाश वाचस्‍पति | निखिल सचन | सोमेश्वर पांडेय | सुनील कुमार सोनू


~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





धर्मयुग-हिन्दुस्तान-कादम्बिनी पढ़ते-पढ़ते मैं कब कविता लिखने लगा मुझे नहीं पता । निश्चित रूप से मेरी पुरानी डायरी में जो कविताएं हैं वे १७-१८ वर्ष की उम्र से पहले की नहीं हैं। उसी समय की एक कविता भेज रहा हूँ जिसे आप पहली कविता मान सकते हैं।

चिड़िया

चूँ -- चूँ करती चिड़िया कहती
सूरज निकला चलो पकड़ने
तिनका-तिनका जुटा-जुटा कर
महल सजालें उसको रखने।
सर्दी--गर्मी सब सह लेती
उसकी मेहनत के क्या कहने
चूँ -- चूँ करती सो जाती है
शाम ढले नित रैन--बिछौने।

--देवेंद्र पांडेय






मैंने अपनी पहली कविता १९८७ में लिखी थी....
आधुनिक नारी के नाम

नारी तू जगजननी है,जगदात्री है,
तू दुर्गा है ,तू काली है,
तुझमें असीम शक्ति भंडार,
फ़िर क्यों इतनी असहाय, निरूपाय,
याद कर अपने अतीत को,
तोड.कर रूढियों-
बंधनों एवं परम्पराओं को.
आंख खोल कर देख,
दुनिया का नक्शा ,
कुछ सीख ले,
वर्ना पछ्तायेगी,
तू सदियों पीछे,
पहुंचा दी जायेगी ।

तू क्यों पुरूष के हाथ की,
कथपुतली बन शोषित होती है?
तू दुर्गा बन, तू महालक्ष्मी बन
तू क्यों भोग्या समर्पिता बनती है?
यह पुरूष स्वयं में कुछ भी नहीं,
सब तूने ही है दिया उसे,
वही तुझे आज शोषित कर,
अन्याय और अत्याचार कर,
तुझे विवश करता है,
अस्मिता बेचने के लिए,
और तू निर्बल बन,
घुटने टेक देती है
क्यों???
क्या तू इतनी निर्बल है?
अगर ऎसा है-
तो घर में ही बैठो,
बाहर निकलने की-
जरूरत नहीं,
पर यह मत भूलो कि-
घर में भी तेरा शोषण होगा ही
फर्क होगा सिर्फ़ ,
हथियारों के इस्तेमाल में ।
तूने इतने त्याग- कष्ट सहे हैं-
किसके लिए?
अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की,
रक्षा के लिए,
या
दूसरो के लिए?
सोच ले तू कहां है?
सब कुछ देकर,
तेरे पास अपना,
क्या बचा है?
कुछ पाने के लिए संघर्ष कर ।
भौतिक सुखों को त्याग कर,
नर-पाश्विकता से जूझ कर,
स्वयं अपने पथ का निर्माण कर,
अपनी योग्यता से आगे बढ. ।
मत सह पुरूष के अत्याचार,
द्ढ. संकल्प लेकर,
बढ. जा जीवन पथ पर,
निराश न हो,
घबरा कर कर्म पथ से,
विचलित न हो,
तू अडिग रह, अटल रह,
अपने लक्ष्य पर,
तेरी विजय निश्चित है ।

तू अपनी "पहचान" को,
विवशता का रूप न दे,
वर्ना नर भेडि.ये तुझे,
समूचा ही निगल जाएंगे ।
खोकर अपनी अस्मिता को,
कुछ पा लेना ,
जीवन की सार्थकता नहीं,
आत्म ग्लानि तुझे,
नर्काग्नि में जलायेगी ।
इसलिए तू सजग हो जा,
तू इन्दिरा ,गार्गी, मैत्रेयी,
विजय लक्ष्मी बन,
कर्म में प्रवृत हो,
अपने लक्ष्य तक पहुंच ।
पुरूष के पशु को पराजित कर,
स्वयं की महत्ता उदघाटित कर,
इसी में तेरे जीवन की,
सार्थकता है,
और
जीवन की महान उपलब्धि भी॥

--डा. रमा द्विवेदी






ये मैंने जनवरी २००३ में लिखी थी जब मैं एक संस्था के जरिये बार्ड्र पर एक टीचर की हैसियत से था...
वहाँ वहीं पर किसी फ़कीर से दोस्ती हो गई.. फ़िर बस मेडिटेशन करना शुरु हुआ और उसी दौरान ये कविता लिखी..
एक उर्दू पत्रिका में भेजी थी पर वापस लौटा दी गई..

मार के सिर मस्जिद और बुतखाने को हम
चले हैं आज फिर से तेरे मैखाने को हम.

सुना है तेरी मस्ती जाती नहीं कभी,
तिशनगी लिए आये हैं तुझे आजमाने को हम.

तू है की पल भर भी नहीं भूलता हमें,
यहाँ याद भी करते हैं दिल बहलाने हम.

बेरुखी मंजूर है तेरी और तेरा पर्दा भी,
तैयार हैं तेरे अहसास में होश गंवाने को हम.

रख लिए हैं हजारों नाम दुनिया ने,
खोज लेंगे हजारों बहाने तेरे क़रीब आने को हम.

बना ले "रिंद" हमें भी अपनी महफ़िल का,
दर जा के अब मिला है सर झुकाने को.

--अशरफ अली "रिंद"





किसी ने कहा था
दुर्घटना की प्रबल सम्भावना है
ध्यान रक्खो.....
मैं पगली, एक-एक कदम
फूँक-फूँक कर रखती रही
गाङी ध्यान से, चलाती रही
लेकिन.....
बेतहाशा भागते
मन की तरफ देखा तक नही
और आज वही मन
बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है
लहूलुहान........
छटपटाता हुआ ..........
कोई भीङ नही जुटी
कोई सहानुभुति नही
कोई मुआवजा नही
फिर भी
दुर्घटना तो घटी ?

--ममता गुप्ता






खुशबू अपनों की
जो नही मिलती भागम भाग मैं
ठहरते है जब एक पल हम
त्ताब याद हम्हे सताती है
जब समय चक्र चल जाता है
टैब सोच बची रह जाती है
इक्छाएं ज्यादा होती है
पर समय गुजर जाता है
अफ़सोस और कुछ न कर पाते हम
भागमभाग की समीकरण का
हिस्सा बन रह जाते हम
जो सुलझ गया वो निकल गया
जो उलझ गया
वो बिखर गया !

--रजत बख्शी






खुदकुशी करनी है गर तो खुदकुशी कर लिजीए,
इल्तज़ा इतनी है लेकिन ज़हर सब को न दीजीए.

जिन्दगी कितनी हसीन, यह तुम समझ पायो नही,
आग नफरत की लगी है आपके दिल मे कहीं;
रोक लो नफरत की आंधी, कुछ रहम तो कीजीए--
प्यार की बरसात से यह आग बुझने दीजीए.
खुदकुशी करनी है गर तो खुदकुशी कर लिजीए,

क़िसकी यह ज़मीन है और किसका आसमान है?
इन सवालों का जवाब खुद से ही परेशान है;
फिर भी इनको अपना कह के, ज़हर यह न पीजीए.
मौत के व्यापार यह कहर तो न किजीए.
खुदकुशी करनी है गर तो खुदकुशी कर लिजीए,

किसका मज़हव अच्छा है, किसकी है यह कौम बडी?
सदीयों से पुरूखों ने भी इस मौज़ू पे है ज़न्ग लडी;
इन्सान तो सब एक है, आप नाम कुछ भी दीजीए;
बांट लो खेमों में "राजी", ज़ान तो न लीजीए.
खुदकुशी करनी है गर तो खुदकुशी कर लिजीए,
इल्तज़ा इतनी है लेकिन ज़हर सब को न दीजीए.

--राजिंदर कुशवाहा






तब मै कक्षा ६ की छात्रा थी। जो मैने अपने पापा जी को खत लिखा था वो १ साल तक घर वापस नही आए थे, इस से मै बहुत दुखी थी...वो क्या था कि मेरे तेज होने के कारण मेरा एड्मिशन सीधे कक्षा ३ से ६ मे कर दिया गया था, लेकिन असल मे दिमाग से कच्ची ही थी, मुझे हमेशा पापा जी की याद आती.. तब मैने उन्हे खत लिखके बुलाना चाहा था.. लेकिन पोस्ट-अफ़िस दुर था और मै छोटी सी... खत उनको तब मिला, जब वो वापस घर आये :), तब मुझे यह भी नही पता था कि मैने कविता लिखी है... ये तो पापा जी ने ही बताया कि अर्रे गुडिया ने तो कविता लिखी है|

पापा आप कब आओगे?
मेरी आँखे तरसी अब तो
बीत गये बरसो अब तो
सुखी धरती, सुखा सा मन
हमको कब हरषाओगे?
पापा आप कब आओगे?
भीगी पलके है मम्मी की
चुप-चुप सी वो रहती है
कई राते जगकर उनकी
आँखो-आँखो मे ही कटती है
दिन भर दादी की खिटपिट
मुझको सुननी पडती है,
रोता है मन, पुछ्ता है मन
पाप आप कब आओगे?
कहकर गये थे, कि
जल्दी आऊँगा, खुब खिलौने-
कपडे लाऊँगा
पर पापा आप यूँ ही आ जाओ
देर न करो, जल्दी आ जाओ
नही चाहिये, वो सारी चीजे
चाहिये बस प्यारे पापा
पापा आप कब आओगे?
स्टेशन पर जब भी कोई
गाडी सीटी बजाती है
लगता है जैसे, आपके
आने की खबर लाती है
बीत जाते है फ़िर घन्टे वैसे
सहपाठी मुझे चिढाते हैं
नही आयेंगे, पाप
कहकर मुझे रूलाते है...
पुछ रहा है दिल मेरा
लिख देना जल्दी से खत मे
पापा आप कब आओगे
कपडे खिलौने भले ना लाना
जल्दी से आप आ जाना....

--गरिमा तिवारी






घर से डांट खा, बस्ता उठा भूखे पेट, कक्षा की पिछली पंक्ति में बैठे, एक किशोर की एक हददर्द से नजर टकराने से अंकुरित हुई थी यह कविता | न जाने वह किशोर कहाँ खो गया | जब भी उसकी याद आती है आँख भर आती है|

जीवन

भीख में मिला
एक वस्त्र
जिसमे
धोखों के धागों से
टीसों के टांके लगे हैं
जख्मों से भरी जेब और
तन्हाईयों के तमगे लगे है
फ़िर भी
अनमोल है यह
समझ मेरी
कीमत न इसकी
आंक पाती है
क्यूंकि कभी कभी
नजर उनकी
सुई सी चुभती हुई
सुख का एक
बटन टांक जाती है |

--विनय के जोशी





मैं आपका आभारी हूँ कि आपके कारण मुझे अपनी पुरानी कविताओं को ढ़ूँढ निकालने की प्रेरणा मिली । निम्नलिखित कविता , जिसे मैंने शायद 14-15 वर्ष की उम्र में रचा था और जो मेरी पहली कविताओं में से एक है, को बड़े परिश्रम से ढ़ूँढ निकाला है । अपनी कविता मैं काव्यपल्लवन के 'पहली कविता' के विशेषांक के लिये प्रेषित कर रहा हूँ ।

"बोतल में !"

मृत्यु बंद है बोतल में,
ज़हर के रुप में !
जीवन बंद है बोतल में,
दवा के रूप में !
रिश्वत बंद है बोतल में,
शराब के रुप में !
बेईमानी बंद है बोतल में,
झूठे लेबल के रुप में !
पैसा बंद है बोतल में,
मिलावट के रुप में !
और तो और,
डेमोक्रेसी बंद है बोतल में,
वोट के रुप में !

-- डा0 अनिल चड्डा






यूं बनी कविता

दिल के किसी कोने से
उगते हैं कुछ विचार
चूजों की तरह
शब्दों का दाना चुगते हैं
स्याही का रस पीते हैं
मिल जाते हैं जब लय के पंख
ऊड़ जाते हैं खुले आकाश मे
कविता बन कर..

यश छाबड़ा

>



मैने देखा

किसी अनिष्ट की
आशंका से भयकंपित
मुट्ठी में बंद किए-
एक कागज का टुकड़ा;
लंबे-लंबे डग भरता
कोई दीन-हीन फटेहाल,
चला जा रहा था-
'मेडिकल स्टोर' की ओर ।

मैने देखा

तभी पुलिसमैन एक
कहीं से आया,
पहचान कर शिकार को
लपका उसकी ओर ।
बोला अबे उल्लू
लंबे-लंबे डग भरता है
जो नियमों के प्रतिकूल है ।
पथ शीघ्र तय करता है
अगर कहीं कुचला गया
किसी सवारी के नीचे,
तो क्रिया-कर्म तेरा
कौन करेगा

यह अपराध है,
कानून का उलंघन है।
मै तेरा 'चालान' कर दूंगा ।
"'चालान' शब्द सुनकर,
दुखिया ने हाथ जोड़ दिए,
पुलिसमैन के पांव पकड़ लिए।
कातर स्वर में बोला
"मेरी बूढ़ी माँ बीमार है,
सख्त बीमार है ।
उसका एक मात्र सहारा,
यह पुत्र, यह अभागा,
दवा लेने जा रहा है।
हाथ जोड़ता हूँ, पाँव पड़ता हूँ,
मुझे छोड़ दे, तेरा उपकार होगा।

"बचना चाहता है
अच्छा चल छोड़ दूंगा
मेरी दाईं हथेली पर
खुजली हो रही है,
उसको शांत कर दे ।
मेरा आशय समझा या समझाउँ तुझे
"तरेर कर आँखे पुलिसमैन बोला ।
"समझ गया माई बाप
मुट्ठी जोर से भींच कर बोला,
"लेकिन एक ही पचास का नोट है
मुट्ठी खोल कर दिखाते हुए बोला,
अगर आपको दे दिया,
तो ..तो.. दवा कहाँ से आयेगी
मेरी माँ मुझसे न छिन जायेगी
जिसे दवा की सख्त जरूरत है

कहते हुए वह कांप रहा था,
"आज छोड़ दे मेरे भाई, मेरे खुदा
फिर कभी ले लेना -
पचास के बदले सौ ।
पाँव पड़ता हूँ तेरे
"लेकिन वह पुलिसमैन
उसकी बात कहाँ सुन रहा था
वह तो जा चुका था
अपने हाथ की खुजली शांत करके,
उस दीन-हीन फटेहाल से
पचास का नोट छीन के ।
किसी अन्य शिकार की टोह में

मैने देखा

--कवि कुलवंत सिंह




स्वाभिमान
हीन भाव से ग्रसित जीव, उत्थान नहीं कर पाता है
हर लक्ष्य अस्संभव दिखता है, जब स्वाभिमान मर जाता है

स्वाभिमान है तेज पुंज, यदि कठिनाई है अन्धकार
यह औषधि है हर रोगों की, गहरा जितना भी हो विकार

यह शक्ति है जो है पकड़ती, छुटते धीरज के तार
यह दृष्टि है जो है दिखाती, नित नए मंजिल के द्वार

यह आन है, यह शान है, यह ज्ञान है, भगवान है
कुछ कर गुजरने की ज्योत है, हर चोटी का सोपान है

हां सर उठाकर जिंदगी, जीना ही स्वाभिमान है
गर मांग हो प्याले जहर, पीना ही स्वाभिमान है

यह है तो इस ब्रम्हाण्ड में, नर की अलग पहचान है
जो यह नहीं, नर - नर नहीं, पशु है, मृतक समान है

--एस. कुमार शर्मा





मेरे लिए निर्णय ले पाना कठिन है ... देखूँ आपका निर्णय ले पाते हैं.... हमने 1972 की पहली कविता और उसके बाद ..... 1995 की पहली कविता लिख भेजी है. इस बीच हमने कविता नहीं लिखी... हाँ 1995 के बाद लगातार लिख रहे हैं....

कैसे कहूँ कि 1972 में लिखी गई कविता पहली है जिसे पढ़कर हिन्दी टीचर ने मम्मी डैडी को बुला कर काउंसलर के पास जाने की सलाह दी क्योंकि चिड़िया के चहचहाने की तुलना बच्चों के हँसने की बजाय रोने से की गई थी. सातवीं कक्षा में हिन्दी टीचर ने कुछ शब्द (सुबह सवेरे, सूरज का उगना, चिड़िया की चहचहाट ) देकर कविता लिखने को कहा था और हमने यह कविता लिखी थी.


सुबह सवेरे सूरज उग जाता

चिड़िया का दाना चुग जाता.




चिड़िया रोती , चींचीं करती

देश के भूखे बच्चों सी लगती.


कहाँ से मैं दाना ले आऊँ

हर चिड़िया की भूख मिटाऊँ.



भूखे बच्चों को रोने न दूँगी

अपने हिस्से का खाना दूँगी.



1995 में दस साल का बेटा वरुण साउदी टी.वी. में हर तरफ फैले युद्ध की खबरें देख कर बेचैन हो जाया करता. दुनिया का नक्शा लेकर मेरे पास आकर हर रोज़ पूछता कि कौन सा देश है जहाँ सब लोग प्यार से रहते हैं...लड़ाई झगड़ा नहीं करते .हम वहीं जाकर रहेंगे...अपने आप को उत्तर देने में असमर्थ पाती थी. ..तब मेरी पहली कविता का जन्म हुआ था उससे पहले गद्य की विधा में ही लिखा करती थी.

प्रश्न चिन्ह

थकी थकी ठंडी होती धूप सी
मानवता शिथिल होती जा रही

मानव-मानव में दूरी बढ़ती जा रही
क्यों हुआ ; कब हुआ; कैसे हुआ ;

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

क्या मानव का बढ़ता ज्ञान
क्या कदम बढ़ाता विज्ञान !

क्या बढ़ता ज्ञान और विज्ञान
मन से मन को दूर कर रहा !

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

मानव में दानव कब आ बैठ गया
अनायास ही घर करता चला गया !

मानव के विवेक को निगलता गया
कब से दानव का साम्राज्य बढ़ता गया !

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

कब मानव में प्रेम-पुष्प खिलेगा ?
कब दानव मानव-मन से डरेगा ?

कब ज्ञान विज्ञान हित हेतु मिलेगा ?
क्या उत्तर इस प्रश्न का मिलेगा ?

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

--मीनक्षी धनवंतरी





मैंने अपनी पहली कविता अपने बी.टेक द्वितीय वर्ष में अपने एक मित्र असित शुक्ला के कहने पे लिखी थी| इसके पहले मैं चार लाइनों को की तुकबंदी, अब उसे शेर कहें या मुक्तक, लिखा करता था| पर उसे शेर नहीं पसंद थे तो उसने मुझे वीर रस की कविता लिखने को कहा तब मैंने अपनी पहली कविता "जागो" लिखी थी
आज उसे ही यहाँ काव्य-पल्लवन के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ

जागो
क्यों बने हुए हो दीन-हीन,
क्यों मायूसी तुम पे छाई,
क्यों देख के यूँ डर जाते हो,
ख़ुद अपनी ही परछाई|
क्या भूल गए कि कौन हो तुम ,
या भूले अपने अंतर को,
तुम उस पूर्वज के वंसज हो,
जो पी गए सारे समन्दर को|
जीवन में दुःख को सहे बिना,
कौन बड़ा हैं बन पाया,
बिन अग्नि में तपे बिना,
क्या सोना कभी चमक पाया|
जग ने कब उनको पूछा है,
जो तकलीफें गिनते रहते हैं,
होते हैं फूलों में काटें भी,
पर वो काटें ही चुनते रहते हैं|
तुम राणा-शिवा के वंसज हो,
जो माने कभी भी हार नहीं,
वीरगति को प्राप्त हुए,
पर छोड़ी कभी तलवार नहीं|
अब तो छोडो ये मायूसी,
अब तो होश में आओ तुम,
पाने के लिए अपना लक्ष्य,
अब तो जान लगाओ तुम|
आज दिखा दो दुनिया को,
साहस की तुम में कमी नहीं,
हार रहे थे अब तक लेकिन,
अभी लड़ाई थमी नहीं|
हर एक लड़ाई जीतोगे,
आज ही ये संकल्प करो,
अपने न सही औरो के लिए,
संसार का काया-कल्प करो|
अपने पे अगर आजाओ तो,
आंधी में दीप जल जायेंगे,
मन में हो सच्ची लगन अगर,
पत्थर पे फूल खिल जायेंगे|
तो,
क्यों बने हुए हो दीन हीन,
क्यों छाई तुम पे ये मायूसी,
वीर को कैसे सुहा सकती है,
कायर सी ये खामोशी,

--शुभाशीष पाण्डेय(2003)






जगबीती भी है...आप बीती भी...कोई तीन साल पहले यूँ ही एक दिन...हर शाम काम से घर लौटकर अपनी देह से जाने कितनी निगाहों को निकालती एक कामकाजी लड़की के दर्द को जुबाँन देने की कोशिश की...ये जगबीती आप बीती भी है...अपनों ने कहा ये कविता है....मेरी पहली कविता...जो डायरी के पन्नों के संग उधड़ ही जाती...यहाँ दर्ज हो गई तो जी गई।

मैं जानती हूँ,
मेरे आँसूओं में हमेशा तुम्हे
कोई संदिग्ध दर्द नज़र आयेगा
मेरे चेहरे पर जमी उदासी पर
तुम लगाओगे अपनी अपनी तरह से
अनुमान,
मेरी हँसी
हमेशा से तुम्हारे लिये.
किसी को रिझा लेने का पर्याय ही रही है..
मैं अपनी दुनिया बदल भी लूँ
बदल लूँ ,
अपनी सोच और हालात,
लेकिन तुम कब तक
गर्त में पड़े रहोगे
और तुम्हारे ज़ेहन से आती रहेगी
सड़ाँध
घड़ी भर के लिये औरत बनकर देखो
जान जाओगे
कि तुम
कोख के अंधेरों से
बाहर ही नहीं आये हो
अब तक

--शिफाली





जब मैं १३ साल की थी और पापा की तबियत ख़राब होने की वजह से मम्मी पापा को मुम्बई जाकर रहना पड़ा था , तब उनकी बहुत याद आती थी , तो इस तरह से इस पहली कविता का जन्म हुआ
माँ के बिना घर अधूरा लगे , ये कमरा ये दर सूना सूना लगे .

लिपटना चाहें ये बाहें गले से माँ के ,
पर इन बाहों को कोई सहारा न मिले .
माँ के बिना घर......
दूर दूर होने लगे अपने, राहों में बिखरने लगे सपने,
इन सपनों को कोई संजो ना सके ,
माँ के बिना घर....
वो ममता भरी प्यार की बातें , बार बार जब याद आने लगें,
ये जग खोखला सा लगा हमें, आंखों से आंसू बहने लगे ,
माँ के बिना घर अधूरा लगे, ये कमरा ये दर सूना सूना लगे .

--पूजा अनिल






नवभारत टाइम्‍स हिन्‍दी दैनिक, नई दिल्‍ली के 21 मार्च 1976 के अंक में प्रकाशित। जहां तक मुझे याद है और तलाशने पर मिली है यही कविता मेरी पहली कविता है जो कि उस समय माया दीदी को भेजी थी, वे ही उस समय बच्‍चों के स्‍तंभ का संपादन करती थीं :-
चाय
चाय नहीं नींदमारक है यह
रोग नहीं रोगनाशक है यह
काम पल में बना देती है यह
सर्दी भी दूर भगा देती है यह
मित्रों को पास बुला देती है यह
क्‍योंकि -
यही चाय का प्रताप है
अब तो इम्‍तहान बहुत पास है।

--अविनाश वाचस्‍पति






एक गांव में ताज़ा बचपन
अमराई पे जुटता था
बौराई चटकी कलियों पे
पागलपन सा लुटता था.
चिकने पीले ढेले लाकर
उनकी हाट जमाता था
पौआ भर गुड़ से भी ज्यादा
उनका मोल लगाता था.
जब नमक लगी रोटी मुट्ठी में
भरकर मजे से खाता था..
तो फसल चाटती हर टिड्डी को
जमकर डांट लगाता था.
अमिया की लंगड़ी गुठली से
सीटी मस्त बजाता था
जब टीले पे बैठा राजा बन
सबपर हुकुम चलाता था.
तो कभी सूर्य तो कभी पवन को
मुर्गा मस्त बनाता था.
कोइ उसके बुढ्ढे चूल्हे में
जब बांसा स्वप्न पकाता था
वो गोबर लिपे चबूतर पे
कोइ ताज़ा स्वांग रचाता था .

एक गांव मे ताज़ा बचपन....
--निखिल सचन





यह कविता संभवत: मैंने सातवीं कक्षा में लिखी थी और यह मेरी सब से पहली कविता या यूं कहिये कुछ लिखने का पहला पर्यास है| पंक्तियाँ जैसीं थीं वैसी ही लिख रहा हूँ 'कविता' में भी बचपना आपको साफ झल्केगा :

दोस्ती

दोस्ती का इजहार करके गधे से भी काम निकलवाती है दोस्ती,
पर जो मरते हैं दोस्ती के लिए कहलाती है वही सच्ची दोस्ती ||

--सोमेश्वर पांडेय




ये हिन्दी गज़ल मैंने अपने कालेज के प्रोफेसर के लिये लिखी थी करीब ८ महीने पहले। क्योंकि वे ६५ वर्ष के होते हुए भी पूरी शक्ति के साथ पढ़ाते थे। वो आजीवन कर्मठ, तेज और संघर्षशील रहे हैं।मैं उनकी कार्यशैली से काफ़ी प्रभावित हुआ।

दर्द के दिन भी क्या बीते मजा आया न जीने में
सुख के अमृत भी जैसे जहर लगे पीने में

ज़िन्दगी का मर्म समझता था तब मैं पल पल
खून बहता था मिलके पसीने में

वो भी क्या दौर था किस्मत को चुनौती दिया करते थे
जोश जज़्बा रग रग बनके दौड़ती थी सीने में

न हाथ पाँव दुखते थे न दिल-दिमाग थकता था
झूमते गाते रहते थहे साल के पूरे महीने में

सुनील कुमार सोनू





Wednesday, May 21, 2008

हँसिकाएं...

1. थाना
मोटर साइकल चोरी की रपट लिखवाने
दोनो भाई साइकल पर थाने गये,
ऐसा पता होता कि पैदल आना पड़ेगा
तो पैदल ही जाते ना.....


2. रेड-क्रॉस

कान में दर्द था,
रेड क्रॉस देखकर झट से अन्दर घुसे
तो औजारों की पाड़ ने बोलने न दिया
दाँत हाथ मे लेकर घर जा रहा हूँ
ये रेड-क्रॉस एक ही रंग का क्यूँ हैं !


3. झण्डा
मास्टर जी झण्डा फहराने
मुहुँ अँधियारे ही समान लेकर चले गये
इधर मास्टरनी दिन भर नहाने को बैठी रहीं..


4. टोपी
बीमार बच्चा चीखकर
बुदबुदाता हुआ क्लीनिक से भागा,
अपना इलाज होता नही लिखा है
'बाल रोग विशेषज्ञ '
डाक्टर साब तब से टोपी पहनते हैं..


5. भाई चारा

नेता जी के स्वागत में
जितने लोग थे.. उनसे कहीं ज्यादा
रास्ता रोकते गाय भेंस भेड़ बकरियां..
भाई-चारे की बात ही कुछ और है..


इससे पहले कि शराब पीना खो दे अपनी अश्लीलता

इससे पहले कि
शराब पीना
खो दे अपनी अश्लीलता
और आम हो जाए
क्रिकेट खेलने की तरह,
उसे लगने लगा है कि
उसे शुरु कर देनी चाहिए शराब।

उसने चुन ली है नीली दीवार,
उस पर लेटकर
वह खेल रहा है ‘चिड़िया उड़’,
उसे प्रेम हो गया है चिड़िया से,
वह खेल रहा है
’मत उड़ चिड़िया’,
चिड़िया को पसंद है
लाल तिनकों का घोंसला
जैसे उसे पसन्द हैं कविताएँ
या उसके पिता को पसन्द है
चाय सुड़कते हुए अख़बार पढ़ना।
यह हज़ारवीं बार है
जब वह लालकिले की एक दीवार पर
दिल बनाकर
पेंसिल से कुरेद आया है
तीर का निशान।
एक लड़की ने फूल से कहा है
कि हँस रही है वह,
फूल मुरझा गया है।

ट्रेन में हो रही है तलाशी
लालकिले पर हमला करने वाले
आतंकवादियों के लिए,
उसके पास नहीं है टिकट,
वह रो रहा है,
डिब्बे में लगा है एक शामियाना
लाल रंग का,
चिड़िया को पसंद था
लाल कालीन,
बंजी जंपिंग
और रॉक क्लाइम्बिंग।
पहाड़ों पर मुट्ठियाँ धँसाकर चढ़ती
चिड़िया के लिए
रो रहा है वह,
किसी ने आकर उसकी आँख में
रख दी है लड़की,
चिड़िया का पंख
और आँख भर तौलिये।

उसके पिता कल परसों में
दायर करने वाले हैं
ज़िला कोर्ट में अपील
कि प्रतिबन्ध लगा दिया जाए
नीले दुख वाली कविताओं पर।

और इससे पहले कि
वह अपने कबाड़ वाले कमरे में
किसी रात गिरफ़्तार कर लिया जाए
अश्लील उदास कविताएँ लिखते हुए,
ज़िन्दा रहने की आखिरी संभावना
को अवसर देने के लिए
उसे लगने लगा है कि
उसे जल्दी शुरु कर देनी चाहिए शराब।


कायनात के पार


शब्दों को बना के मिलन का सेतु
मैं अपने दिल के इस किनारे से
तेरे दिल के उस किनारे को छूती हूँ
जहाँ कोई याद जैसे
होंठो पर सिसकती..
थिरकती ,मचलती
नदी सी मुझे लगती है
और तब नयनों से जैसे
कोई बदरी बिन बरखा के बरसती है

और फ़िर यूं ही कुछ उभरे हुए
अखारों की जुबान
पूछती है एक सवाल
नही जानती किस से?
क्या मिलेगा कभी कोई जवाब मुझे
अपने ही भीतर दहकते इस लावे का
कौन हिसाब देगा मुझे?

बस जानती हूँ कि
एक जमीन ...एक आसमान
बसते है इस माटी के पुतले में भी
और मोहब्बत का जहान
एक जाल कभी बुनता है
कभी उलझता है
चाहता है सिर्फ़
यह उसी मोहब्बत का तकाजा
हमसे......
जिसका दीदार
सिर्फ़ इस कायनात के पार होता है ..
और यह सफर यूं ही अधूरा रहता है....

रंजू